पहला छत्तीसगढ़ी हॉलीवुड स्टार :- एक गुमनाम कलाकार

छत्तीसगढ़ बस्तर के जिला मुख्यालय नारायणपुर से महज कुछ दूर पर गांव गढ़बेंगाल है | जो कि चेंदरू मंडावी का गाव है | वैसे गांव आज भी गांव ही है,शहर का प्रभाव ज्यादा कुछ नहीं पड़ा है | गांव को देखने के बाद कभी भी नहीं लगता है कि कभी इस गांव में हालीवुड का सुपर स्टार टाइगर ब्वाय चेंदरू मंडावी रहता था | गांव वालों की माने तो यही कहते हैं कि हां बहुत अच्छा आदमी था,उसके वजह से गांव को लोग जानते हैं पर गांव तो गांव है साहब देख तो रहे हो चेंदरू का गांव को | ये भी सच है कि गांव तो गांव ही होता है वो चाहे बस्तर मोगली चेंदरू का ही गांव क्यों ना हो |

आज टाइगर व्वाय चेंदरू को गुजरे वर्षों हो गये पर उनकी यादें आज भी ताजा हैं,गढ़ बेंगाल की रहने वाली दादी अम्मा नाम नहीं बताती हैं पर पर पूछने पर यही कहती हैं कि- हव जानूंसे,चेंदरू मंडवी आय काय,मरलो जानू,खूबय दिन होली | चेंदरू लोगों की जुबान पर दूर आसमान पर है,आज हम चेंदूरू के कुछ पहलुओं के बारे में बातें जानने का प्रयास करेंगे जैसा कि देखा,सुना,पढ़ा व स्थानीय जानकारों से प्राप्त जानकारी के अनुसार लिखने का प्रयास किया है |

प्राचीन पौराणिक कथाओं में उल्लेख पाया जाता है कि किसी जमाने मे शकुंतला दुष्यंत के पुत्र भरत बाल्यकाल में शेरों के साथ खेला करते थे,वैसे ही नजारा बस्तर का मोगली ब्वाय चेंदरू का था,बस्तर का यह लड़का शेरों के साथ खेला करता था। यह लड़का और कोई नहीं द जंगल सागा का सुपर हीरो मोगली ब्वाय के नाम से मशहूर चेंदरू था । चेंदरू द टायगर बाय के नाम से मशहुर चेंदरू पुरी दुनिया के लिये किसी अजुबे से कम नही था। बस्तर मोगली नाम से चर्चित चेंदरू पुरी दुनिया में 60 के दशक में बेहद ही मशहुर था। चेंदरू के जीवन का दिलचस्प पहलू था उसकी असली बाघ(टाइगर)से दोस्ती, वह भी वास्तविक जंगल के। दोस्ती भी ऐसी कि दोनों हमेशा साथ ही रहते थे,खाना,खेलना, सोना सब साथ-साथ। चेंदरू की कहानी टाइगर के साथ ही उतार और चढ़ाव करती है,जब टाइगर बिछड़ता है तो जीवन भी बदलते देर नहीं लगती,ग्लैमरस की दुनिया का सितारा चेंदरू से गांव का चेदरू बन जाता है | जो एक सामान्य जीवन शैली की दास्तान कहती है |

स्थानीय जानकार कहते हैं कि- सांगसत काय बाबू चेंदरू बाघ संगे खेले मने ना,मान्तर आमी जानू काय फेर बाघ तो मरली ना,चेंदरू बले मरलो | खूबे डंड पावलो साहब | बस्तर का रियल मोगली कहलाने वाले चेंदरू ने 2013 में दुनिया से चल बसा । साठ साल पहले चेंदरु ने दुनिया भर का ध्यान खींचा था। फ्रांस, स्वीडन, ब्रिटेन और दुनिया के कोने-कोने से लोग सिर्फ उसकी एक झलक देखने को, उसकी एक तस्वीर अपने कैमरे में कैद करने को बस्तर पहुंचते थे। बस्तर की माड़िया जनजाति का चेंदरु मंडावी पूरी दुनिया में टाइगर ब्वॉय और रियल मोगली के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

चेंदरू मंडावी बचपन से बड़ा ही बहादुर था। बचपन में एक बार दादा ने जंगल से शेर के शावक को लाकर दिया। जिसे चेंदरू ने अपने दोस्त के रूप में पाला और बढ़ा किया,चेंदरू ने उसका नाम प्यार से टेंबू रखा था। इन दोनो की पक्की दोस्ती थी। दोनो साथ मे ही खाते, घुमते और खेलते थे। इन दोनो की दोस्ती की जानकारी धीरे धीरे पुरी दुनिया में फैल गयी। स्वीडन के ऑस्कर विनर फिल्म डायरेक्टर आर्ने सक्सडॉर्फ चेंदरू पर फिल्म बनाने की सोची और बीहड़ में खोजते ढूढंते पूरी तैयारी के साथ बस्तर के गढ़बेंगाल चेंदरू के गांव पहुंच गए। घने जंगलो से घिरा घनघोर अबूझमाड़ का बस्तर का दौरा करते स्वीडिश डायरेक्टर अर्ने सक्सडोर्फ़(Arne Sucksdorff) की नजर इस बच्चे पर पड़ी। तो देखा कि जंगल में शेरों के साथ सहज दोस्ती डायरेक्टर को इतनी भा गई कि उनसे रहा नहीं गया। फिर तैयार हुआ एक फिल्म “द जंगल सागा” जिसमे लीड रोल पर था बस्तर का “टाइगर ब्वाय” चेंदरू। फिल्म के रिलीज़ होते ही चेंदरू रातोंरात हालीवुड स्टार बन गया था | देश विदेश में बस्तर को पहचान दिलाने वाले चेंदरु पर 1957 में ‘एन द जंगल सागा (En djungelsaga)’ इंग्लिश में: द फ्लूट एंड द एरो (The Flute and the Arrow)नाम की स्वीडिश फिल्म बनी थी,उसके दोस्त टाइग़र के साथ उसकी दोस्ती के बारे में दिखाया गया था। चेंदरू ने ही इस फिल्म के हीरो का रोल किया और यहां रहकर दो साल में शूटिंग पूरी की। इस फिल्म ने उसे दुनिया भर में मशहूर कर दिया। इस फ़िल्म में रविशंकर ने संगीत दिया था, फिल्म में संगीत रविशंकर ने दिया,कहते हैं कि उस दौर में रविशंकर अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्षरत थे और उस समय उन्हें खास चेंदरू के संगीतकार के तौर पर जाना जाने लगा था। 1957 में चेंदरू ने 75 मिनट की मूवी “एन द जंगल सागा”, जब पुरे यूरोपीय देशों के सेल्युलाईड परदे पर चली तो लोग चेंदरू के दीवाने हो गए, चेंदरू रातोंरात हालीवुड स्टार हो गया। स्वीडन में चेंदरू कुछ सालों तक डायरेक्टर के घर पर ही रुका रहा।डायरेक्टर आर्ने सक्सडॉर्फ चेंदरू को गोद लेना चाहते थे चेंदरू को आर्ने सक्सडॉर्फ गोद लेना चाहते थे लेकिन उनकी पत्नी एस्ट्रीड बर्गमैन सक्सडॉर्फ (Astrid Bergman Sucksdorff) से उनका तलाक हो जाने के कारण ऐसा हो नहीं पाया। एस्ट्रीड एक सफल फोटोग्राफर के साथ-साथ लेखिका भी थी। फ़िल्म शूटिंग के समय उन्होंने चेंदरू की कई तस्वीरें खीची और उन्होंने चेंदरु पर ‘ब्वाय एंड द टाइगर (Chendru: The Boy and the Tiger)’ नाम की एक किताब भी लिखी थी।

विदेश में रहने के बाद जब स्वदेश पहुंचे और उसके बाद चन्दरु वापिस लोगों से मिले,तब देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरूजी से मुलाकात पर नेहरू जी ने चेंदरू को मुंबई रुकने की सलाह दी। पर भीड़भाड की जिंदगी से कोसों दूर और पिता के बुलावे पर चेंदरू वापिस अपने घर बस्तर के गढ़ बेंगाल आ गया। गुमनामी और अभावों में गुजारी ज़िन्दगी चकाचौंध ग्लैमर में जीने का आदी हो चुका चेंदरू गांव में गुमसुम सा रहता था। यहां उसका मन नहीं लगता था,उसे गुजरे दिन याद आते थे,जहाँ फिर उनकी जिंदगी अभावो से गुजरती हुई बीती। जब किशोर उम्र के चेंदरू विदेश से वापस गांव आए तो फिर उनके सामने ज़मीनी सच्चाई थी। बस्तर की धरती की उपेक्षा समझ आ रही थी | समय के साथ चेंदरू नारायणपुर के गढ़ बेंगाल,बस्तर के जंगल में गुम होते चले गए। चेंदरू जब विदेश से लौटे तो कई साल तक वे गांव के लोगों से अलग-थलग रहे। वो सोंचते रहे कि वो जिन्दगी कहां और हमारी जिंदगी कहां | कहते हैं ना कि जिन्दगी इम्तहान लेती है ये जीवन का दूसरा पड़ाव था जहां हालीवुड स्टार चेदरू को ग्राउंड जीरो की कहानी गढ़नी थी | मन तो चंगा था पर समय छलनी-छलनी थी | उम्मीदें फिसलपट्टी के फिसलन की तरह हूबहू जीवन से दूर सपने से लगने लगे थे | कहते हैं कि एक समय ऐसा आया कि गुमनामी के दुनिया में पुरी तरह से खो गया था जिसे कुछ पत्रकारों ने पुन 90 के दशक में खोज निकाला। फिल्म में काम करने के बदले उसे दो रूपये की रोजी ही मिलती थी। चेेंदरू की करूण कहानी का अंत किसी फिल्म की पटकथा के समाप्त होने की तरह 18 सितम्बर सन 2013 में लम्बी बीमारी से जूझते हुए इस गुमनाम हीरो ने महारानी अस्पताल जगदलपुर बस्तर में इलाज के दौरान मृत्यु की आगोश में सो गया |

स्थानीय जानकारों की मानें तो चेंदरू भी बेहद खुशमिज़ाज किस्म के इंसान थे किसी भी दूसरे माड़िया आदिवासी की तरह चेंदरू बेहद खुशमिज़ाज और बहुत सारी चीज़ों की परवाह न करने वाले हैं। लेकिन चेंदरू के सामने उनका अतीत आकर खड़ा हो जाता है, एक सपने की तरह, शायद इससे वे मुक्त नहीं हो पाए। चेंदरू के बेटे जयराम मंडावी और उनका परिवार आज भी गढ़बेंगाल में निवास करता है |

यह बात महत्वपूर्ण है कि बस्तर में प्रतिभाओं की कमी नहीं है,फिर कई बार उपेक्षात्मक रवैयों के शिकार हो जाते हैं,दोषी कौन है आप हम | बस्तर की धरोहरों को बस्तर के माटी पुत्रों को देश दुनिया के सामने आने के बाद उनकी पिछली जिन्दगी से जरूरी उनके वर्तमान जीवन की खोज खबर जरूरी हो गई है | वरना कल को फिर कोई टाइगर ब्वाय चेंदरू की तरह परदे के पीछे गुमनाम होकर बदतर जिन्दगी में घूटकर मरने को मजबूर हो जायेगा | ये जिम्मेदारी आपकी और हमारी है कि हम बस्तर की प्रतिभाओं और माटी पुत्रों को उनकी खुशियां बरकरार रखने में कामयाब रहें तभी हमारी टाइगर ब्वाय रियल मोगली द जंगल सागा के सुपर हीरो को सच्ची श्रद्धांजलि होगी ताकि कल किसी को यह दिन देखना ना पड़े |

खैर,टीस और मन की खटास लिये इस भावना के साथ कि स्व. चेंदरू मंडावी | आपने जो किया उसके कर्जदार हैं हम फिर भी हम सजल नयनों से विनम्र श्रद्धांजलि समर्पित करने का साहस कर रहे हैं,हमारी जिम्मेदारियां यहीं खत्म नहीं होती हमें आपने ही यह सीख दी है | आपको नमन |

ये थी हमारी खास पुण्यतिथि विशेष बस्तर के धरोहर टाइगर ब्वाय स्व. चेंदरू मंडावी की कहानी | फिर हाजिर होंगे किसी और हमारे धरोहर की कहानी लेकर तब तक के लिए इजाजत दीजिए |