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ताई मां के स्वर में एक कसक थी. वे सोचने लगीं कि जब फेसबुक दुनियाभर के दोस्तों को मिलाने का काम कर रहा है, तो घर के मुख्य सदस्य या मुखिया अपने संवाद के माध्यम से यह कार्य और भी बेहतर ढंग से क्यों नहीं कर सकते?

लेखिका : संगीता सेठी

प्रियंका और समीर ताई मां के पास शादी के पूरे एक साल बाद हैदराबाद आए हैं. प्रियंका अपने ससुराल से अपनी मां के पास पूना के लिए निकली, तो ताई मां के आग्रह पर हैदराबाद रुक गई. वो चहकी-चहकी-सी ताई मां के घर-आंगन में घूम रही थी. ताई मां को बचपन से ही प्रियंका से लगाव रहा है. उनकी दो बेटियों के जन्म के बाद देवर के घर प्रियंका का जन्म हुआ, तो अपनी बेटी जैसे फ्रॉक, स्कर्ट और लहंगा पहनाकर सारे शौक़ पूरे करते-करते प्रियंका कब उनके क़रीब आ गई, एहसास ही नहीं हुआ. प्रियंका ताई मां से अपने ससुराल के सदस्यों की बात साझा कर रही थी कि उसके मोबाइल की मधुर धुन बज उठी.

“ओह! ताई मां, देवर का फोन है. आज दिनभर बात नहीं हुई ना…” यह कहकर प्रियंका देवर से बात करने में व्यस्त हो गई. लंबी बातचीत के बाद देवरानी से भी बात की. बात जैसे ही समाप्त हुई बोली, “ताई मां, अपनी सासू मां और ससुरजी से भी बात कर लूं, तो आज की बातचीत पूरी हो. फिर आपसे बात करती हूं. प्लीज़, बुरा मत मानना.”
ताई मां प्रियंका को डायनिंग टेबल पर बात करने के लिए अकेला छोड़कर स्वयं किचन में चली गईं. मलाई कोफ्ता बनाने की तैयारी करते समय वे सोचने लगीं कि क्या यह वही प्रियंका है, जो पिछले साल अपने लैपटॉप और मोबाइल की स्क्रीन पर फेसबुक के दोस्तों से चैट करते ना अघाती थी. तब एक दिन उन्होंने टोका भी था, “प्रियंका, फेसबुक पर ही लगी रहोगी, तो अपने आसपास के रिश्ते कैसे निभाओगी. ससुराल में सबसे कैसे सामंजस्य बैठाओगी.”

“बस, ताई मां, एक फ्रेंड रिक्वेस्ट और ये दो अपडेट्स का जवाब दे दूं, फिर फेसबुक लॉगआउट कर देती हूं. इसके बाद लैपटॉप पर मुझे अपना प्रोजेक्ट भी पूरा करना है. मैं फेसबुक तो स़िर्फ 15 मिनट ही देखती हूं.” प्रियंका ने सफ़ाई देने की कोशिश की. ताई मां जानती हैं कि फेसबुक का आकर्षण कितना सम्मोहित कर लेता है
इंसान को. वे ख़ुद भी तो कुछ महीनों से फेसबुक की गिरफ़्त में हैं. भले ही वे संगीत पसंद करनेवालों के दल में शामिल हैं, पर दिन में दो बार फेसबुक का पेज खोलकर ज़रूर देख लेती हैं. उनके बहुत-से दोस्त आशा और मुकेश के गाने पोस्ट करते हैं, पर जब कोई लता का गाना पोस्ट करता है, तो वे उसे सुनने का मौक़ा नहीं चूकतीं.
यह अलग बात है कि उन्होंने अपने स्कूल के स्टाफ के एक भी सदस्य को अपनी फेसबुक लिस्ट में शामिल नहीं किया है. वे नहीं चाहतीं कि स्टाफ में उनके अपडेट्स पर कोई चर्चा करे. और ना ही वे आजकल की लड़कियों की तरह फेसबुक इस्तेमाल करती हैं और ना ही ज़्यादा लोगों से चैट ही करती हैं, पर वे जानती हैं कि उन्हें भी फेसबुक का नशा है, लेकिन उनके इस एडिक्शन के बारे में कोई नहीं जानता. माइक्रो ओवन के बंद होने की आवाज़ ने ताई मां को वर्तमान में ला दिया और माइक्रो ओवन से आलू निकालकर वे छीलने बैठ गईं. प्रियंका मोबाइल पर सभी से बातचीत समाप्त करके सीधे किचन में आकर ताई मां के गले लग गई.

“ताई मां, मेरी सासू मां कहती हैं कि हमारे घर के सभी यानी सातों सदस्यों को हर रोज़ एक-दूसरे से बात करनी ही है और…”
“सात सदस्य कौन?” ताई मां ने प्रियंका को बीच में ही टोका.
“सात सदस्य यानी मैं और समीर, मेरे देवर अंकित, उनकी पत्नी सौम्या, सासू मां, ससुरजी और दादी मां. मेरी सासू मां कहती हैं कि रोज़ बात करने से एक-दूसरे से संवाद बना रहता है. साथ ही ये संवाद रिश्ते की दूरी को भी पाटता है. रोज़ ही बात करते रहने से कभी इस बात का एहसास ही नहीं होता कि हम सब दूर रहते हैं.”
“यानी एक-दूसरे के अपडेट्स पढ़ते हैं और स्टेटस डालते हैं फेसबुक की तरह.” ताई मां ने कहा, तो प्रियंका खिलखिलाकर हंसने लगी. उसकी हंसी रुकी, तो बोली, “ताई मां, आप भी फेसबुक जानने लगीं? आप तो मुझसे अक्सर मज़ाक किया करती थीं ना कि मेरा फेस ही नहीं है, तो बुक कहां से लाऊं.”

“हां प्रियंका, पर तेरी सासू मां तो मार्क ज़ुकरबर्ग से भी बढ़कर ग़ज़ब का फेसबुक चला रही हैं. यही तो फेसबुक का कॉन्सेप्ट है कि एक जगह बैठकर हम सभी अपनी बातचीत एक-दूसरे से शेयर कर सकें. पहले के ज़माने में तो चौपाल हुआ करती थी या आंगन, जहां गली-मोहल्ले के स्त्री-पुरुष बैठकर आपस में बतियाते थे. अब तो किसी के पास एक-दूसरे के लिए समय ही नहीं है.”
“हां, इसलिए तो सासू मां कहती हैं कि इस भागदौड़भरी ज़िंदगी में भी सभी को आपसी बातचीत के लिए आधा घंटा समय तो निकालना ही है. हमारे परिवार के सदस्यों को छह लोगों से बात करनी होती है. प्रत्येक व्यक्ति पांच मिनट भी निकाले, तो आधे घंटे में 36 लोगोें से बातचीत हुई समझो.”
“वाह! तुम्हारी सासू मां तो मार्क ज़ुकरबर्ग से भी होशियार निकलीं, पर इससे भी बढ़कर एक फेसबुक तो सदियों से चलता आ रहा है प्रियंका, जो मेरी नानी चलाती थीं. वे पोस्टकार्ड के ज़रिए कमाल का फेसबुक चलाती थीं.” ताई मां प्रियंका को बताते-बताते पुरानी यादों में डूब गईं. वे याद करने लगीं, जब उनकी नानी दोपहर का चौका-बर्तन समेटने के बाद अपनी दोनों बहुओं को पोस्टकार्ड थमा देती थीं.

“सोनी कुड़ियों लिखो ख़त आपणी नणदां नूं.” फिर बड़ी बहू हीरा को कहतीं, “लै! लिखा वीरांवाली को… मैंने कैरी काटकर सुखा दी है. तेरे आने तक अचार गल जाएगा…” और छोटी बहू रज्जी को कहतीं, “तू स्वर्णा को लिख दे, इस बार अपनी सास को भी ले आए. हमारा घर ना सही, पर दिल तो बड़ा है. किसी बात की फ़िकर ना करे…”
दोनों बहुएं ख़त लिखते-लिखते घर के अपडेट्स जान जाती थीं. भाभी-ननद के बीच मां के माध्यम से हुआ संवाद रिश्तों में मज़बूती का एक और स्तंभ खड़ा कर देता था. भाभियां भी मां की बातचीत ख़त्म होने के बाद अपनी मर्ज़ी से दो-तीन लाइनें लिख डालतीं और इस तरह न केवल सासू मां के संवाद बेटियों तक पहुंचते, बल्कि भाभियों के हस्तलेख में संवाद का विस्तार भी ननदों को भाभियों के नज़दीक ला देता. ननदों के मन में लेशमात्र भी विचार नहीं आता कि ये ख़त मां ने लिखवाया है या भाभी ने. क्या ये पोस्टकार्ड फेसबुक के अपडेट्स से कम थे?” ताई मां प्रियंका को बताते-बताते भावुक हो गईं. “हमारी बीच की पीढ़ी ने ये समझा ही नहीं कि ननद-भाभी के बीच मां द्वारा लिखवाए गए ख़त ना जाने कितने रिश्तों के बीच पुल का काम करते हैं. लेकिन हमारी पीढ़ी में रिश्तों के दो अलग-अलग खंभों पर कभी संवाद की रेल गुज़री ही नहीं और मुझे हर रिश्ता दूर ही नज़र आया…”

ताई मां के स्वर में एक कसक थी. वे सोचने लगीं कि जब फेसबुक दुनियाभर के दोस्तों को मिलाने का काम कर रहा है, तो घर के मुख्य सदस्य या मुखिया अपने संवाद के माध्यम से भला यह कार्य और भी बेहतर ढंग से क्यों नहीं कर सकते?
“तुम्हारी सासू मां भी यह काम बेहतरीन तरी़के से कर रही है प्रियंका.” ताई मां ने कड़ाही में कोफ्ते डालते हुए कहा.
“हां, मुझे भी सबसे बात करना अच्छा लगता है. जब तक सबसे बात न कर लूं, कुछ कमी-सी लगती है और दिन अधूरा-अधूरा-सा
लगता है.”
“जैसे कुछ लाइक करने से छूट गया हो.” और ताई मां-प्रियंका ज़ोर से हंस पड़ीं.

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