कहानियां किस्से

एक बार फिर…

रिश्तों को सहेजने का कोई भी मौक़ा हाथ से नहीं जाने देना चाहिए. रिश्तों में ‘देर’ जैसा शब्द न गिरनेवाली दीवार जैसा होता है… देर हो गई यह सोचकर और देर कभी नहीं करनी चाहिए. पहल के लिए कोई मुहूर्त नहीं निकाला जाता… प्रिया, फिर से आ जाओ मेरी ज़िंदगी में, हमेशा के लिए… लेखिका […]

कहानियां किस्से

मदर्स डे

हमारी मांएं हमें पाल-पोसकर बड़ा करती हैं और कुछ सालों बाद हम ससुराल आ जाती हैं. वहां हमें सास के रूप में दोबारा मां मिलती है. वो हमारा ख़्याल रखती है और कुछ सालों बाद हमारी अपनी बहुएं आती हैं. वे सबसे लंबा समय हमारे साथ बिताती हैं. वह समय हमारी बीमारी, कमज़ोरी और कष्ट […]

कहानियां किस्से

करवा चौथ

“पूर्णा बिल्कुल सही है. सारे नियम हम महिलाओं के लिए क्यों? विवाह के बंधन में तो स्त्री-पुरुष दोनों बंधते हैं. फिर सुहाग चिह्न स्त्रियों के लिए क्यों? पुरुषों के लिए कोई सुहाग चिह्न क्यों नहीं? ये सब स़िर्फ व स़िर्फ शृंगार के सामान हैं, जो स्त्री इसे चाहे पहने, जो न चाहे न पहने. बिल्कुल […]

कहानियां किस्से

फेसबुक डॉट कॉम

ताई मां के स्वर में एक कसक थी. वे सोचने लगीं कि जब फेसबुक दुनियाभर के दोस्तों को मिलाने का काम कर रहा है, तो घर के मुख्य सदस्य या मुखिया अपने संवाद के माध्यम से यह कार्य और भी बेहतर ढंग से क्यों नहीं कर सकते? लेखिका : संगीता सेठी प्रियंका और समीर ताई […]

कहानियां किस्से

ऊंचा क़द

उसे देख मुझे एहसास हो रहा था कि इंसानियत और बड़प्पन हैसियत की मोहताज नहीं होती. वह तो दिल में होती है. अचानक मुझे एहसास हुआ, मेरे और रमाशंकर के बीच आज भी प्रतिस्पर्धा जारी है. इंसानियत की प्रतिस्पर्धा, जिसमें आज भी वह मुझसे बाज़ी मार ले गया था. पद भले ही मेरा बड़ा था, […]

कहानियां किस्से

अतिक्रमण

हम मांएं बेटियों को पुरुषों के कार्यक्षेत्र में उतरने के लिए प्रोत्साहित करती हैं, इसे समय की आवश्यकता बताकर समाज की वाहवाही लूटती हैं, लेकिन बेटों को यह सोचकर घरेलू कामों से दूर रखती हैं कि यह तो स्त्रियों का कार्यक्षेत्र है, इसमें उन्हें व्यर्थ ही अतिक्रमण की कहां आवश्यकता है? क्यूं घर संभालना सिखाऊं? […]

कहानियां किस्से

चौपाल

“सोच, मर जाता तू, तो कैसे आता इस स्वर्ग में. और मान ले कि तीनों अच्छे होते, तो क्या हो जाता? तुझे एयरकंडीशन कमरा दे देते, एक मोटा गद्दा डलवा देते, देखभाल के लिए नर्स रख देते, घूमने को ड्राइवर भी दे देते, सोने की थाली में खाता तू, पर खाता तो यही दलिया ही […]

कहानियां किस्से

तुझे सब था पता मेरी मां…

दिल पत्थर का किए बिना अपने दस साल के बच्चे को अपने से अलग कैसे कर देती? लौटी हूं तो लग रहा है कि अपने शरीर का कोई टुकड़ा काटकर कहीं और रख दिया है. कोई अंग कट जाता, तो भी शायद इतनी तकलीफ़ नहीं होती, जितनी तुम्हें ख़ुद से अलग करके हो रही है. […]

कहानियां किस्से

लौट आओ अचल

“शिकवा-शिकायतें कैसी, बस लौट आओ… लौट आओ अचल, मैं वहीं तो खड़ी हूं, बदला कहां कुछ. हां, समय सरक गया है. हम-तुम शारीरिक रूप से पहले जैसे नहीं रहे. मेरे और अपने मन से यह अलगाव वाला समय हटा दो, तो हम वहीं एक-दूसरे के इंतज़ार में खड़े मिल जाएंगे…” लेखिका : शैली खत्री चटकीली […]

कहानियां किस्से

अग्निपरीक्षा

मैं सब सुन रही थी, सह रही थी, भीषण अग्नि में झुलस रही थी, जिसका ज़रा भी एहसास तुम्हारे भइया को नहीं था. वह तलाक़ लेने की प्रक्रिया पूरी कर अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को बचा रहे थे. सच पूछो तो यह और कुछ नहीं, बल्कि सदियों से चला आ रहा उनका पुरुषोचित दंभ मात्र था. […]