विमर्श समालोचना

जीवन का पूरा मजा लेने वाली जेनरेशन

लेखक : संजय कुंदन आजकल समाज और अर्थव्यवस्था के संदर्भ में एक शब्द बार-बार आ रहा है- मिलेनियल्स। इसका आशय उस पीढ़ी से है, जो 1990 से 2000 के बीच पैदा हुई। यानी 20 से 30 वर्ष के नौजवान। ये जीवन के अहम पड़ाव पर हैं और ये ही देश के भावी कर्णधार हैं। देश […]

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मोदी-शाह ने असंभव को संभव कर दिखाया

लेखक : अरुण जेटली (लेखक बीजेपी के वरिष्ठ नेता हैं) संसद का वर्तमान सत्र उपलब्धियों की दृष्टि से अत्यंत सफल रहा है। इसमें कई ऐतिहासिक विधेयक पारित किए गए हैं। तीन तलाक कानून, आतंक पर कठोर प्रहार करने वाले कानून और अनुच्छेद 370 पर निर्णय। ये सभी निश्चित तौर पर अप्रत्याशित हैं। यह आम धारणा […]

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बंद के दिन कुछ ज्यादा ही खुल जाता है भारत

लेखक : स्व. शरद जोशी और कहीं का पता नहीं, मगर हमारे मालवा में एक एकादशी होती रही है, जिसे कहते हैं देवसोनी एकादशी। बचपन में सुनता था कि उस एकादशी को देवता सो जाते हैं और फिर चार महीने तक सोए रहते हैं। जो भी शुभ काम करना होता था, उस एकादशी के पहले […]

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नियम की आड़ में क्रिकेटरों की बेइज्जती

लेखक : मनोज चतुर्वेदी भारतीय क्रिकेट के पिछले दो दशकों के दिग्गजों की बात करें, तो सबसे पहले सचिन तेंडुलकर, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण और सौरव गांगुली का नाम जेहन में आता है। भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाइयां दिलाने में इस चौकड़ी की अहम भूमिका रही है। पर आजकल यह चौकड़ी ‘हितों के टकराव’ के […]

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अंग्रेज चले गए लंदन छोड़ गए

सुधीर मिश्र in खुले मन से अकबर इलाहाबादी साहब का शेर है- मरऊब हो गए हैं विलायत से शेख-जी अब सिर्फ मना करते हैं देसी शराब को मरऊब मतलब प्रभावित होना। शायर के निशाने पर कोई शेख साहब हैं। शायद, विलायत से लौटने के बाद उनके नाज-नखरे बढ़ गए होंगे। लिहाजा, शायर के निशाने पर […]

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कला के दो विपरीत ठिकाने और बारिश

लेखक : ओमा शर्मा झमाझम होती बारिश का उस रोज हुए कला के दो नितांत अलग या कहें परस्पर विरोधी अनुभवों से कोई रहस्यमय ताल्लुक रहा होगा, इसीलिए इन दिनों मुंबई में होती बारिश मुझे उस घटना की याद दिलाती है। कथाकार-चित्रकार मित्र प्रभु जोशी की दो रोज पहले ही प्रदर्शनी संपन्न हुई थी। बची […]

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जैसे-जैसे सुलझते हैं, दिलचस्पी बढ़ाते हैं ब्रह्मांड के रहस्य

चंद्रभूषण in नजरबट्टू जैसे हमारे सौरमंडल में सारे ग्रह सूरज के इर्दगिर्द एक ही दिशा में घूमते हैं, उसी तरह हमारी आकाशगंगा में सारे तारे भी इसके केंद्र की एकदिश परिक्रमा करते हैं। लेकिन इस किस्से में आगे एक बड़ा झोल आता है। हम जैसे-जैसे सूरज से दूर जाते हैं, ग्रहों की रफ्तार कम होती […]

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गले केले जैसा मुंह लेकर, गोरी कश्मीरी लड़की के सपने ठीक नहीं

उपमा सिंह in स्मॉल टाउन गर्ल बहुत सुणे मन्ने ताणे, पड़ी 370 हटवाणी, अरे, छोड़ के बिहार, बहू कश्मीर त्ये ल्याणी। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 खत्म हुए महज पांच दिन बीते हैं और मार्केट में यह गाना हिट हो चुका है। यही नहीं, सारे रांडे खुस हो रै, बहू कश्मीर तै लानी सै… ‘बहू कश्मीर […]

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कुछ का द ऐंड को गया है तो दूसरे वेटिंग लिस्ट में हैं

लेखक : प्रभुनाथ शुक्ल हमारे देश में हरियाली का अकाल पड़ गया है। विकास की बुलट ट्रेन शहर बसा रही है, जिसकी वजह से गांव और जंगल उजड़ रहे हैं। नतीजा पर्यावरण के साथ जल संकट भी खड़ा हो गया है। हरियाली नहीं बची तो जीवन नहीं बचेगा। पेड़ मर गए तो जीवन मर जाएगा। […]

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बूंदों में भीगना चाहती थी ‘लिफ्ट वाली जिंदगी’

लेखक : विवेक शुक्ला शाम के 6 बज चुके हैं। नेहरू प्लेस मेट्रो स्टेशन पर हर तरफ से मुसाफिर आ रहे हैं। सबकी चाल में तेजी को महसूस किया जा सकता है। बूंदाबांदी शुरू हो चुकी है। पर गोरे लाल मेट्रो स्टेशन से सटी एक इमारत से अपनी ड्यूटी खतम करके निकला है। उसे बारिश […]