विमर्श समालोचना

विजयादशमी : विजय मानवता की अंतिम उपलब्धि नहीं!

राघवेंद्र शुक्ला in शब्दभेदी विजय ही जीवन का ध्येय है। विजय ही श्रेष्ठ प्राप्य है। विजय ही सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य है। विजय चाहिए, केवल विजय। पराजय कमजोरी और अयोग्यता का प्रतीक है। इसीलिए इतिहास गाथाएं केवल विजेताओं के गौरवगान से भरी पड़ी हैं। पराजित का जीवन कितना भी आदर्शमय क्यों न हो, वह दर्ज नहीं होगा। […]

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जिम्मेदार नागरिक बनने का एक और अवसर

लेखक : सहीराम सरकार हमेशा ही हमें जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए प्रोत्साहित करती है। जैसे जब भी मौका लगता है, यह जरूर कहती है कि कानून और व्यवस्था बनाए रखना सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, नागरिकों की भी जिम्मेदारी है। इसी से प्रोत्साहित होकर भीड़ कभी गौ-तस्करों को निपटा देती है और कभी […]

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दिल के रोग हंस कर टालने से मौत नहीं टलती

लेखक : प्रदीप सरदाना दुनिया भर में दिल की बीमारियों और उनके खतरों में बढ़ोतरी देखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने सभी को जागरूक करने के उद्देश्य से साल 2000 से ‘विश्व हृदय दिवस’ मनाने की शुरुआत की। तब से हर साल सितंबर महीने की 29 तारीख को वर्ल्ड हार्ट फाउंडेशन विश्व भर में इसका आयोजन […]

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अहम है असम राइफल्स के भविष्य का सवाल

पूनम पांडे in नॉनस्टॉप असम राइफल्स का आईटीबीपी (इंडो-टिबेटन बॉर्डर पुलिस) में विलय करने पर केंद्र सरकार विचार कर रही है। इसे लेकर 2009 में ही चर्चा शुरू हो गई थी। तब से अब तक इस बारे में कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्यॉरिटी (सीसीएस) के सात ड्राफ्ट आ चुके हैं। हाल ही सीसीएस का नया ड्राफ्ट […]

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कृष्णगोपाल जी! संघ और भारत समानार्थी नहीं हो सकते

विश्व गौरव in शाश्वत सोचिए, भारत विशिष्ट क्यों है? हमें भारत से इतनी आत्मीयता क्यों है? हम क्यों भारत की मिट्टी में अपनी ‘मां’ खोजते हैं? क्या इसलिए क्योंकि इस देश में नेहरू, गांधी, इंदिरा या नरेंद्र मोदी ने जन्म लिया? या फिर इसलिए क्योंकि इस देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसा संगठन या बीजेपी […]

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सुप्रीम कोर्ट ने दिया आरटीआई का नया औजार

राहुल पाण्डेय in चक्र-व्यू पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने सूचना का अधिकार अधिनियम के बारे में एक फैसला दिया है, जो भ्रष्टाचार से लड़ने वालों के लिए बड़ा कारगर हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक देश भर में जिस भी ट्रस्ट, सोसायटी या एनजीओ ने किसी भी रूप में ‘पर्याप्त’ सरकारी मदद […]

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थॉमस कुक के ढहने में कई धंधों की बर्बादी के संकेत

चंद्रभूषण in नजरबट्टू ब्रिटेन की नामी टूर एंड ट्रैवल कंपनी थॉमस कुक की हालत गड़बड़ थी लेकिन कर्ज के बोझ से दबकर वह अचानक ढह ही जाएगी, इसका अंदाजा किसी को नहीं था। डेढ़ अरब पाउंड (13,226 करोड़ रुपये) के कर्ज की बात कंपनी की ओर से पिछले साल ही कही गई थी। यह रकम […]

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यूनिवर्सिटी में पढ़ाई छोड़कर सब हो रहा है?

श्रेयांश त्रिपाठी in यूनिवर्सिटी रोड कल शाम एक खबर पढ़ रहा था। बेंगलुरु के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज में केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि देश में अगले तीन सालों के भीतर 175 गीगावॉट बिजली का उत्पादन होगा। इसमें सोलर एनर्जी से 100 गीगावॉट और शेष अन्य स्रोतों […]

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सरकार के साथ ही बदल जाता है देशभक्ति का मापदंड

रमेश जोशी in झूठा सच आजकल कमर और घुटनों में थोड़ा दर्द रहने लगा है, विशेषकर काफी देर तक बैठने के बाद जब उठते हैं। वैसे ही जैसे कई वर्षों तक सत्तासीन रहने के बाद किसी को निर्देशक मंडल में बैठाते समय होता है। डॉक्टर ने कहा- सुबह-सुबह थोड़ा घूम लिया करोगे तो कंट्रोल में […]

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बाकी विज्ञानों से बहुत अलग है प्योर मैथ का जादू

चंद्रभूषण in नजरबट्टू एक विज्ञान के रूप में गणित की छवि किसी तपस्वी की साधना जैसी ही है। इसकी क्रांतिकारी खोजें भी प्राय: अचर्चित रह जाती हैं। या चर्चित होने में उन्हें इतना वक्त लगता है कि खोजी के लिए अपनी खोज ही बेमानी हो जाती है। इसके दो उज्ज्वल अपवाद यूनान के आर्किमिडीज और […]